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बुद्ध का पर्यावरणीय दृष्टिकोण

मनुष्य और प्रकृति साथ कैसे रहे, यह मौजूदा दौर का सबसे अहम सवाल है। गौतम बुद्ध कहते है कि 'मनुष्य को चाहिए कि प्रकृति में पेड़-पौधे एवं तमाम जीव-जंतुओं के साथ नदी-तालाब के जल को स्वच्छ रखें और उनकी रक्षा करें, तभी मनुष्य स्वयं भी स्वस्थ रह पायेगा।' आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ने भौगोलिक, प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण के साथ भवन निर्माण में पर्यावरण और पारिस्थितिकी की शुद्धता पर भी बल दिया, यह अद्भुत है। पानी का दुरुपयोग निषिद्ध मानते थे। विनयपिटक के चुल्लवग्ग में वे बताते हैं कि समुद्र कमशः गहराई और स्थित धर्म का होता है। वह कभी किनारे को नहीं छोड़ता नदी से पानी दुर्गति नहीं करता, बल्कि लहरों से उन्हें बाहर फेंक देता है। वह नदियों को अपने में मिलाकर समुद्रीय कर लेता है। वह एक समान और एकरस वाला रहता है तथा बहुरत्नों विशालकाय जीवों को भी शरण देता है। इससे पता चला है कि बुद्ध का भौगोलिक और प्राकृतिक पर्यावरण ज्ञान कितना गहन था।
Photo: Pinterest

बुध्द का मानना था कि प्रदूषण को दो स्तर पर समझना और रोकना चाहिए-
पहला:- मनुष्य इकाई के स्तर पर तथा दूसरा सामुदायिक स्तर पर। उनका दृढ मत था कि यदि अकेला व्यक्ति सुधर जाए और अपने आसपास के पेड़-पौधों, जीव-जंतु के प्रति सहायता का व्यवहार करने लगे और संवेदनशील हो जाए, तो समुदाय और समाज में पर्यावरण सुधार अपने-आप आ जायेगा। उन्होंने इसके लिए पंचशील का सिध्दांत समाज को दिया- किसी जीव की हिंसा में रत मत हो, बिना दी हुई वस्तु मत लो, कामवासना में रत मत हो, झूठ, कठोर और मिथ्या वचन से बचो, शराब और अन्य नशीले पदार्थों और प्रमादक स्थानों से दूर रहो। स्वस्थ मानवीय समाज की स्थापना के लिए यह उपदेश सूत्र स्वरुप है।

तथागत बुद्ध ने कहा कि संसार में पशु-पक्षियों, पेड़-पौधे, कीडे-मकडी में जातियां होती है, जिन्हें दूर से देखकर पहचाना जा सकता है, लेकिन मनुष्य को देखकर उसकी जाति नहीं जानी जा सकती। इसलिए संसार में मनुष्य की एक ही मनुष्य जाति है। इसमें कोई पृथक्कता नहीं है।

दूसरी स्थापना यह है कि कोई भी व्यक्ति जन्म के आधार पर न तो नीचा होता है और न ऊंचा। अपनी कमी से मनुष्य ऊंचा और नीचा हो सकता है।
पेड़-पौधों के मध्य, उजानी, वनों और नदियों के किनारे, नगरों, खामोश से हटकर भिक्षु आवास-विहार बनाने का नियम बुद्ध ने बनाया था। आज हजारों विहारों, महाविहारो, स्तूपों के ध्वंसावशेषों, वनों-उजानी में, नदियों के किनारे ही मिलते हैं। विहारों के निर्माण में ध्यान रखा जाता था कि किसी भी ओर से हवा चले, तो पूरे भवन में हवा और प्रकाश पहुंचता रहे, विहार के मध्य में अंजना, एक कोने पर कुआ, गंदा पानी निकालने के लिए नालियाँ होना आवश्यक है।

बाहर से आनेवाला लोगों के लिए नियम था कि वे हाथ-पांव धोकर ही विहार में प्रवेश करेंगे, जिसके लिए अलग पानी का प्रबंध रहता था। विहार के लिए एक ओर पुष्करिणी का भी होना आवश्यक था। विनयपिटक से ज्ञात होता है कि पर्यावरण की शुद्धता के लिए ही यह नियम बनाया गया था कि हरियाली पर कोई पेशा या शौच न करें, पानी में पेशाब-शौच न करें और खड़े-खड़े भी पेशाब-शौच करने की मनाही थी। गौतम बुद्ध ने पानी के समुचित उपयोग पर बल दिया है। उनके गृह त्याग का एक कारण रोहिणी नदी के पानी के बंटवारे के लिए शाक्य और उनके पडोसी राज्य कोरियोग्राफर के बीच युद्ध की नौबत उत्पन्न हो जाना था। उन्होंने अपनी शिक्षाओं द्वारा वृक्षारोपण के महत्व को समझाया और अपने अनुयायियों को प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवन जीने की प्रेरणा दी ।

-भावना भारती
एमिटी युनिवर्सिटी
कोलकाता

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विदेशों में परामर्श के लिए डाइटिशियन होते हैं जो डॉक्टर के भांति स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करते हैं, परंतु भारत में इस समय केवल बड़े हॉस्पिटल में ही आहार विशेषज्ञ होते हैं। स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाले आहार विशेषज्ञ केवल महानगरों में ही है।

अगर आप डाइट के बारे किसी आम आदमी से पूछे तो उत्तर होगा कि पेट भर के खाओ और ठीक से पच जाए तो वही सही आहार है। अगर आप पूछे कि मोटापा कम करना है तो सीधा-साधा उत्तर मिलेगा कि कम खाओ और दबाकर काम करो। अपने आप वजन कम हो, छरहरा होना या बिना कमजोरी के वजन कम करना उतना आसान नहीं है, जितना आसान प्रतीत होता है, फिर भी यह कार्य कठिन भी नहीं है। प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक क्षमता, पाचन शक्ति और जीवनशैली का भी आहार से सीधा संबंध होता है। इसलिए आहार का चुनाव करते समय इस बात का सदैव ध्यान रखें।।
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कोरोना वायरस से बचने के लिए जितना जरूरी लॉकडाउन है, उससे ज्यादा जरूरी है इस दौरान खान-पान का ध्यान रखना। प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए डॉक्टर पौष्टिक आहार की सलाह दे रहे हैं। जिला अस्पताल के एसआईसी डॉक्टर एके सिंह ने बताया कि आयुष मंत्रालय की ओर से जारी निर्देश को अगर लोग मान ले तो निश्चित तौर पर लोगों की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत मजबूत होगी। उन्होंने अपील की है कि लोग लॉकडाउन का पालन जरूर करें ।

आयुष मंत्रालय की सलाह-
1. पूरे दिन गर्म पानी पीते रहे।
2. नियमित रूप से कम से कम 30 मिनट तक योगासन, प्राणायाम और ध्यान करें।
3. घर में मौजूद हल्दी, जीरा, धनिया और लहसुन आदि मसालों का इस्तेमाल भोजन बनाने में जरूर करें।
4. जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम है, वह चवनप्राश का सेवन करें।
5. तुलसी, दालचीनी, कालीमिर्च, सोंठ पाउडर और मुनक्के (नहीं है तो सूखी अदरक को पीसकर चूर्ण बना लें) से बनी काली चाय को दिन में एक से दो बार पिएं।
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