Skip to main content

ईमानदारी की श्रेष्ठता

अजीब स्वभाव है मानव का! हमारी भले ही ईमान से जान पहचान ना हो, पर हम चाहते हैं कि हमारे संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति ईमानदार हों। व्यापार में, व्यवहार में , साहित्य में या संसार में सभी जगह ईमानदारी की मांग है। मालिक चाहता है कि उसका नौकर ईमानदार हो। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसके साथी ईमानदार मिले। पर क्या खुद को कभी टर्टोलेंगे। बेईमान लोग तो काले धन पर होने वाले सर्जिकल स्ट्राइक से भी आधा हो जाते हैं, परंतु ईमानदार लोग ऐसे फैसले से लाभ प्राप्त करते हैं।

ईमानदारी के चलते ही दरिद्र होते हुए भी यदि हम गहरी नींद सो सकते हैं तो हमारी ईमानदारी का फल है। ईमान का अभाव होता है तो धन धान्य के ऊपर लौटने पर भी हमें आंसुओं में डूबे रहते हैं। जो व्यक्ति ईमानदारी से मेहनत करता है और उसी का फल खाने में विश्वास करता है वह सुख व आनंद से जीता है।

यह कथन शत प्रतिशत सत्य है कि बेईमानी के लाख रुपए में भी वह ताकत नहीं, जो इमानदारी के एक रुपए में है। बेईमानी के महल में वह शांति कहां जो ईमानदारी की झोपड़ी में है। पहले में पीड़ा बनकर प्रकट होगी तो दूसरे में किसी का आशीर्वाद प्रकाश बनकर चमक उठता है।

ईमानदारी से ईश्वर ने इंसान को तीन ऐसे कीमती उपहार दिए हैं। जिस का सही प्रयोग कर कोई मनुष्य बड़ा वैज्ञानिक या फिर जादूगर बना है और जिस मनुष्य ने इसका सही उपयोग नहीं किया है उनके माथे पर नाकामयाबी का भारी कलंक है। वह तीन कीमती उपहार जो कि हमारे जीवन का गूढ़ रहस्य है-  स्मरणशक्ति, मनोयोग, और मानसिक शक्ति है। इन उपहारों को पाने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि इस धरती में अपना पहला कदम रखते ही यह तीन ईश्वरी भेंट हमारी निजी संपदा बन जाते है।

अतः अपनी छोटी उम्र से ही बेकार की बातें या चिंतन में अपना कीमती समय ना गवां कर समय के सही मूल्य को पहचान कर अपने लगन और अच्छे विचारों द्वारा इन तीन निजी ईश्वरीय भेटों का सदुपयोग करते हुए हमारे जीवन रूपी पंछी को उच्चता के शिखर पर पहुंच जाना चाहिए। अतः हमारी जीवन की नैया डोर को सागर में एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचाने के लिए स्मरण शक्ति मनोयोग और मानसिक शक्ति का सदुपयोग करते हुए हमें कर्म पर ध्यान रखना अति आवश्यक है।

मुंशी प्रेमचंद का कथन बिल्कुल सही है कि,“ईमानदार मनुष्य स्वभावत: स्पष्टभाषी होते हैं, उन्हें अपनी बातों में नमक मिर्च लगाने की जरूरत नहीं होती”
                                                      
-प्रेरणा यादव,
एमिटी यूनिवर्सिटी
कोलकाता

Comments

Post a Comment

Most Popular

ज्योतिष विज्ञान और कोरोना- ज्योतिषाचार्य राजकिशोर

वर्त्तमान समय में कोरोना महामारी एक ऐसा संकट है , एक ऐसी समस्या है जिससे न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि पूरा विश्व जूझ रहा है। बार बार लोगों के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ एक ही सवाल आ रहा है और उस सवाल ने सभी की रातों की नींद उड़ा कर रख दी है कि कोरोना महामारी का अंत कब होगा ? इस महामारी के संकट से कैसे और कब छुटकारा मिल पायेगा ?

धरती का सबसे छोटा बच्चा!

काका उदास थे। उदासी उनके पास कोई पड़ा कारण नहीं था। बदलती आबोहवा से जब भी परेशानी होती है, उदासी उनके चेहरे पर बैठ जाती है। जब कोई चिड़िया गीत गाती हुई फुर्र से उड़ती है या कोई वृक्ष तेज हवा में घूमने लगता है, तब जाकर उनका चेहरा सामान्य हो पाता है। वे बड़ी देर से चुप बैठे थे। जो व्यक्ति खुद में उतर रहा हो या सामने किसी दृश्य को टटोल रहा हो, उसे टोकना अच्छी बात नहीं है। मौन में भी मजे है। मैं कभी-कभी सोचने लगती हूं कि पृथ्वी पर चिड़िया कब आयी होगी। हठात काका का मौन टूटा। वे मुझसे पूछ रहे थे कि तुम्हें क्या लगता है, पृथ्वी पर मानव पहले आया होगा और बहुत दिनों के बाद जब वह बोर होने लगा होगा, तब चिड़िया बनायी गयी होगी! मुझे चुप देख कहने लगे कि मनुष्य के पास चिड़िया बनाने का कोई हुनर नहीं है। इतने उपकरण और होशियार हो जाने के बाद, अगर आज भी मानव चिड़िया बनाने बैठे तो असफलता ही हाथ लगेगी। इस बात से यह साबित होता है कि मानव बाद में आया होगा, चिड़िया पहले आयी होगी। वे कहने लगे कि वृक्ष चिड़िया का घर तो होता ही है, साथ ही उनका जीवन भी होता है। पृथ्वी पर पहले वृक्षों को लगाया गया होगा कि चिड़िया आ

झारखंड का आदिवासी समाज और भूमि का उत्तराधिकार!

यूं तो झारखंड के आदिवासी समाज में औरतों की स्थिति, अन्य समाज की स्त्रियो की तुलना में पुरुष से संपत्ति के अधिकार की हो, तो ये उन सारी महिलाओं से पिछडी है जो अन्य क्षेत्रों में इनका अनुकरण करती है। आपको यह जानकर विस्मय होगा कि राज्य के जनजातीय समाज में महिलाओं को अचल संपत्ति में कोई वंशानुक्रम का अधिकार नहीं दिया जाता है। वर्तमान युग में, जब लैंगिक समानता का विषय विश्व भर में जोरों से चर्चा में है, यह अति अफसोसनाक है कि प्रदेश की आदिवासी महिलाओं को प्रथागत कानून के तहत भूमि के उत्तराधिकार से वंचित रखा गया है। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 कि धारा 7 एवं 8 में इस बात का उल्लेख है कि आदिवासी समाज में जमीन का उत्तराधिकार सिर्फ पुरुष वंश में ही किया जा सकता है। अर्थात, समाज की औरतों को इसका कतई अधिकार नहीं। हालांकि अधिनियम कि एक अन्य धारा पर गौर किया जाय तो यह मालूम होता  है कि यादि आदिवासी समाज में भूमि का हस्तांतरण, भेंट अथवा विनिमय किया जाना हो तो इसके लिए वंशानुगत पुरूष अथवा ‘अन्य ‘ योग्य है। जहां एक तरफ संथालपरगना के इलाके में ‘तानसेन जोम’ की परंपरा हैं, वही दूसरी तरफ संथालपरगना का

नव वर्ष 2022 में राहु, केतु, शनि और गुरु ग्रहों का गोचर एवं उनका विभिन्न चंद्र राशियों पर होने वाला प्रभाव

2021 की समाप्ति और 2022 की शुरुआत बड़े ही नाटकीय ढंग से हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि 2021 के आखिरी महीने यानी की दिसंबर महीने में कोरोना के एक और रूप ओमीक्रॉन ने बड़े ही अलग तरीके से, बिना किसी लक्षण के अचानक ही पूरे विश्व पर धावा बोल दिया। भारत या अन्य देश इसके रूप, स्वरुप, असर, परिणाम  को जान और समझ पाते उससे पहले ही इसने लगभग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। कोरोना ने इस नए रूप में आकर सभी को एक बार फिर डरा दिया है।