Skip to main content

विकसित देशों के पैंतरे- भावना भारती

मौजूदा संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को संकटग्रस्त कर दिया है और इसके असर से कोई भी देश अछुता नहीं है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि आर्थिक मोर्चे पर पैदा हुई समस्याओं से छुटकारा पाने में कई महीने लग सकते हैं। जाहिर है कि आयात और निर्यात के समीकरण तथा टैक्स व शुल्क के हिसाब में भी बदलाव होगे तथा कुछ दुसरे देशों के बाजारों मे अपनी पहुंच बढ़ाने की कवायद भी करेंगे। ऐसी ही एक कोशिश में विकसित देशों ने विश्व व्यापार संगठन में स्थायी रूप से आयात शुल्कों में कटौती का प्रस्ताव रखा है।

इन देशों का तर्क है कि इस पहल से कोरोना संकट का मुकाबला करने में मदद मिलेगी। लेकिन कोरोना केवल बहाना है। यह महामारी तो देर-सबेर खत्म हो जाएगी और वैक्सीन व दवा की उपलब्धता के साथ ही दुनिया संक्रमण के डर से मुक्त हो जायेगी। यह बात विकसित देशों को भी मालूम है, तो फिर एक अस्थायी संकट की आड़ मे शुल्कों में स्थायी कटौती की मांग क्यों की जा रही है? भारत ने इस मांग का विरोध करते हुए स्पष्ट तौर कहा है कि असल में ये देश अन्य देशों में अपने उत्पादों के लिए बाजार का विस्तार करना चाह रहे  हैं। विकसित देशों को यह समझना चाहिए की आयात शुल्क देशों की आमदनी का अहम स्त्रोत होने के साथ उनके घरेलू उद्योगों और उद्यमों के संरक्षण भी करते हैं। विश्व व्यापार संगठन के और मुक्त व्यापार से जुड़े अन्य कई समझौतों की वजह से विकसित देशों को पूरी दुनिया में बाजार उपलब्ध हुआ है तथा शुल्कों की दरें भी अधिक नहीं है। जिन उत्पादों पर शुल्क कम करने कि मांग की जा रही है, उनमें दूध, कृषि और मेडिकल से जुड़े उत्पाद भी है।

मेडिकल साजोसामान के उदयोग नए क्षेत्र हैं, और भारत इनमें तेजी से उभर रहा है। दूध, कृषि के उत्पाद भारत समेत अनेक उभरती अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं तथा घरेलू मोर्चे पर रोजगार और आमदनी का बड़ा जरिया होते हैं। अभी तो समस्याएं पैदा हुईं हैं, उनकी सबसे अधिक मार विकासशील देशों को ही झेलनी पड़ी है। ऐसे में विकसित देशों को उनकी मदद करने के लिए आगे आना चाहिए, ना कि हालात का फायदा उठा कर अपने वैचारिक और वित्तीय हितों को साधने का प्रयास करना चाहिए। यह पहली बार नहीं हो रहा है कि विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उभारती अर्थव्यवस्थाओं पर विकसित देश दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कृषि में अनुदान, देशी उद्योग को संरक्षण तथा ई- कॉमर्स व डेटा संग्रहण को लेकर भी खींचतान होती रही है। अब जब भारत आत्मनिर्भर होकर वैश्विक परिदृश्य में योगदान व सहयोग का संकल्प कर रहा है, तो वह अपने बाजार को सस्ते आयातित सामानों से भर देने की छूट नहीं दे सकता है। ऐसा ही अन्य विकासशील देशों के साथ भी है।
-भावना भारती

Comments

Post a Comment

Most Popular

ज्योतिष विज्ञान और कोरोना- ज्योतिषाचार्य राजकिशोर

वर्त्तमान समय में कोरोना महामारी एक ऐसा संकट है , एक ऐसी समस्या है जिससे न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि पूरा विश्व जूझ रहा है। बार बार लोगों के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ एक ही सवाल आ रहा है और उस सवाल ने सभी की रातों की नींद उड़ा कर रख दी है कि कोरोना महामारी का अंत कब होगा ? इस महामारी के संकट से कैसे और कब छुटकारा मिल पायेगा ?

धरती का सबसे छोटा बच्चा!

काका उदास थे। उदासी उनके पास कोई पड़ा कारण नहीं था। बदलती आबोहवा से जब भी परेशानी होती है, उदासी उनके चेहरे पर बैठ जाती है। जब कोई चिड़िया गीत गाती हुई फुर्र से उड़ती है या कोई वृक्ष तेज हवा में घूमने लगता है, तब जाकर उनका चेहरा सामान्य हो पाता है। वे बड़ी देर से चुप बैठे थे। जो व्यक्ति खुद में उतर रहा हो या सामने किसी दृश्य को टटोल रहा हो, उसे टोकना अच्छी बात नहीं है। मौन में भी मजे है। मैं कभी-कभी सोचने लगती हूं कि पृथ्वी पर चिड़िया कब आयी होगी। हठात काका का मौन टूटा। वे मुझसे पूछ रहे थे कि तुम्हें क्या लगता है, पृथ्वी पर मानव पहले आया होगा और बहुत दिनों के बाद जब वह बोर होने लगा होगा, तब चिड़िया बनायी गयी होगी! मुझे चुप देख कहने लगे कि मनुष्य के पास चिड़िया बनाने का कोई हुनर नहीं है। इतने उपकरण और होशियार हो जाने के बाद, अगर आज भी मानव चिड़िया बनाने बैठे तो असफलता ही हाथ लगेगी। इस बात से यह साबित होता है कि मानव बाद में आया होगा, चिड़िया पहले आयी होगी। वे कहने लगे कि वृक्ष चिड़िया का घर तो होता ही है, साथ ही उनका जीवन भी होता है। पृथ्वी पर पहले वृक्षों को लगाया गया होगा कि चिड़िया आ

झारखंड का आदिवासी समाज और भूमि का उत्तराधिकार!

यूं तो झारखंड के आदिवासी समाज में औरतों की स्थिति, अन्य समाज की स्त्रियो की तुलना में पुरुष से संपत्ति के अधिकार की हो, तो ये उन सारी महिलाओं से पिछडी है जो अन्य क्षेत्रों में इनका अनुकरण करती है। आपको यह जानकर विस्मय होगा कि राज्य के जनजातीय समाज में महिलाओं को अचल संपत्ति में कोई वंशानुक्रम का अधिकार नहीं दिया जाता है। वर्तमान युग में, जब लैंगिक समानता का विषय विश्व भर में जोरों से चर्चा में है, यह अति अफसोसनाक है कि प्रदेश की आदिवासी महिलाओं को प्रथागत कानून के तहत भूमि के उत्तराधिकार से वंचित रखा गया है। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 कि धारा 7 एवं 8 में इस बात का उल्लेख है कि आदिवासी समाज में जमीन का उत्तराधिकार सिर्फ पुरुष वंश में ही किया जा सकता है। अर्थात, समाज की औरतों को इसका कतई अधिकार नहीं। हालांकि अधिनियम कि एक अन्य धारा पर गौर किया जाय तो यह मालूम होता  है कि यादि आदिवासी समाज में भूमि का हस्तांतरण, भेंट अथवा विनिमय किया जाना हो तो इसके लिए वंशानुगत पुरूष अथवा ‘अन्य ‘ योग्य है। जहां एक तरफ संथालपरगना के इलाके में ‘तानसेन जोम’ की परंपरा हैं, वही दूसरी तरफ संथालपरगना का

ईमानदारी की श्रेष्ठता

अजीब स्वभाव है मानव का! हमारी भले ही ईमान से जान पहचान ना हो, पर हम चाहते हैं कि हमारे संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति ईमानदार हों। व्यापार में, व्यवहार में , साहित्य में या संसार में सभी जगह ईमानदारी की मांग है।

नव वर्ष 2022 में राहु, केतु, शनि और गुरु ग्रहों का गोचर एवं उनका विभिन्न चंद्र राशियों पर होने वाला प्रभाव

2021 की समाप्ति और 2022 की शुरुआत बड़े ही नाटकीय ढंग से हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि 2021 के आखिरी महीने यानी की दिसंबर महीने में कोरोना के एक और रूप ओमीक्रॉन ने बड़े ही अलग तरीके से, बिना किसी लक्षण के अचानक ही पूरे विश्व पर धावा बोल दिया। भारत या अन्य देश इसके रूप, स्वरुप, असर, परिणाम  को जान और समझ पाते उससे पहले ही इसने लगभग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। कोरोना ने इस नए रूप में आकर सभी को एक बार फिर डरा दिया है।