Skip to main content

ना धर्म देखा ना उम्र देखा, ना अमीर देखा और ना ही गरीब!

कोरोना महामारी से एक बात तो साफ हो गई कि प्रकृति ही सबसे बड़ा धर्म है। इसने किसी भी धर्म को अनदेखा नहीं किया और सब पर बराबर की मार की है। चाहे वह किसी भी धर्म का हो, अमीर हो या गरीब, कोरोना ने किसी को नहीं छोड़ा।
धर्म के नाम पर अपने आप को कोरोना से सुरक्षित नहीं रखा जा सका है। दुनिया के सबसे बड़े ईसाई धर्म में चाहे इटली हो, स्पेन हो या फिर अमेरिका इसकी मार से कोई नहीं बचा है। यहां तक कि चीन में बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही सबसे पहले कोरोना का कहर झेलना पड़ा है और अपने देश भारत में भी हिंदुओं पर हनुमान जी की आशीर्वाद नहीं बनी और इसी तरह इस्लाम में भी अल्लाह के बंदे को इसकी नेमत हासिल नहीं हुई। कितनी अजीब बात है कि आज कोरोना ने सारे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च में ताले जड दिए गाए हैं।

इसका मतलब यह है कि अब प्रभु की प्रार्थना भी स्वीकार नहीं, जब से संसार बनी और जीवन व मनुष्य को पनपाया। तब से हम खेमों में नहीं बंटे थे। प्रकृति ने हमें बेहतर जीवन जीने के गुण दिये। हमने अपने तरीके से जीने के रास्ते को धर्मों में बांट दिए।

वर्ष 2020 की शुरुआत पूरे विश्व के लिए अच्छी नहीं रही। हर मनुष्य में संरचनाओं का आधार ही प्रकृति है। यह एक ऐसा शास्त्रपूर्ण तर्क है, जो न मानते हुए भी सर्वमान्य है। अब यह तो तय है कि जब आपको मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा व चर्च नहीं बचा सके, तो स्वीकार करें कि प्रकृति ईश्वरवाद से ऊपर है। इससे साथ सीमा से अधिक छेड़छाड़ किसी भी रूप में या कभी भी हम पर एक बड़ी मार दे सकती है।

पिछले पांच दशकों को ही देख लें, दुनियाभर में बिगड़ते पर्यावरण पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो-हल्ला मचा, पर वायु प्रदूषण हो, मरती नदियों हो या मिट्टी की बिगड़ती गुणवत्ता हो और प्राकृतिक वनों की कटाई हो, इन पर हमने ठीक से ध्यान नहीं दिया। वैसे अंतर्राष्ट्रीय शोर- गुल के बीच समाधान निकालने की कोशिश भी हुई, पर वे आधी-अधूरी ही रही।

यही समय है कि हम सभी गफलत भरी मान्यताओं को दरकिनार करते हुए प्रकृति के सिद्धांतों और नियमों को समझकर अपना आनेवाला समय तय करे। अपनी सीमाओं को जान ले और उल्लंघनों के दोष को समझ ले। शायद तब ही हम बच पायें। कोरोना भी प्रकृति का ही उत्पाद है और इसने इशारा कर दिया है कि अब ज्यादा खंडता स्वीकार नहीं है। हमारा पहला दायित्व इनके संरक्षण की चिंता से जुड़ा होना चाहिए।

विकास की अंधी दौड़ में विनाशा ने आंखें खोल दी, पर अभी लड़खड़ाए ही हैं, पूरी तरह गिरे नहीं। आज प्रकृति के बचने-बचाने की चिंता पर ज्यादा बात होनी चाहिए। आज जैसी महामारी दुनिया में सभी धर्मों को झेलनी पड़ रही  हैं। उसका संकेत स्पष्ट है कि प्रकृति ही सब कुछ है और बेहतर जीवन इसी से संभव है। अच्छा होगा, हम इसको जितना जल्दी समझें और अपनी जीवनशैली सुधार, हम अपना आनेवाला समय श्रेष्ठ कर सकेंगे। अगर समझ में आ जाये कि प्रकृति ही हमें बचा सकती है, तो हम मिलकर इसका नमन करे और माफी मांगते हुए उसकी अलौकिक क्षमताओं पर कार्य करें।

प्रार्थना करें कि अब कोरोना न रहे, बल्कि करो ना पर उतर आयें। प्रकृति मंत्र से ही जीवन तंत्र जुड़ा है और तब ही इस महामारी से अच्छी तरह मुकाबला कर पायेंगे।


- भावना भारती
एमिटी यूनिवर्सिटी
कोलकाता


Comments

Post a Comment

Most Popular

ज्योतिष विज्ञान और कोरोना- ज्योतिषाचार्य राजकिशोर

वर्त्तमान समय में कोरोना महामारी एक ऐसा संकट है , एक ऐसी समस्या है जिससे न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि पूरा विश्व जूझ रहा है। बार बार लोगों के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ एक ही सवाल आ रहा है और उस सवाल ने सभी की रातों की नींद उड़ा कर रख दी है कि कोरोना महामारी का अंत कब होगा ? इस महामारी के संकट से कैसे और कब छुटकारा मिल पायेगा ?

धरती का सबसे छोटा बच्चा!

काका उदास थे। उदासी उनके पास कोई पड़ा कारण नहीं था। बदलती आबोहवा से जब भी परेशानी होती है, उदासी उनके चेहरे पर बैठ जाती है। जब कोई चिड़िया गीत गाती हुई फुर्र से उड़ती है या कोई वृक्ष तेज हवा में घूमने लगता है, तब जाकर उनका चेहरा सामान्य हो पाता है। वे बड़ी देर से चुप बैठे थे। जो व्यक्ति खुद में उतर रहा हो या सामने किसी दृश्य को टटोल रहा हो, उसे टोकना अच्छी बात नहीं है। मौन में भी मजे है। मैं कभी-कभी सोचने लगती हूं कि पृथ्वी पर चिड़िया कब आयी होगी। हठात काका का मौन टूटा। वे मुझसे पूछ रहे थे कि तुम्हें क्या लगता है, पृथ्वी पर मानव पहले आया होगा और बहुत दिनों के बाद जब वह बोर होने लगा होगा, तब चिड़िया बनायी गयी होगी! मुझे चुप देख कहने लगे कि मनुष्य के पास चिड़िया बनाने का कोई हुनर नहीं है। इतने उपकरण और होशियार हो जाने के बाद, अगर आज भी मानव चिड़िया बनाने बैठे तो असफलता ही हाथ लगेगी। इस बात से यह साबित होता है कि मानव बाद में आया होगा, चिड़िया पहले आयी होगी। वे कहने लगे कि वृक्ष चिड़िया का घर तो होता ही है, साथ ही उनका जीवन भी होता है। पृथ्वी पर पहले वृक्षों को लगाया गया होगा कि चिड़िया आ

झारखंड का आदिवासी समाज और भूमि का उत्तराधिकार!

यूं तो झारखंड के आदिवासी समाज में औरतों की स्थिति, अन्य समाज की स्त्रियो की तुलना में पुरुष से संपत्ति के अधिकार की हो, तो ये उन सारी महिलाओं से पिछडी है जो अन्य क्षेत्रों में इनका अनुकरण करती है। आपको यह जानकर विस्मय होगा कि राज्य के जनजातीय समाज में महिलाओं को अचल संपत्ति में कोई वंशानुक्रम का अधिकार नहीं दिया जाता है। वर्तमान युग में, जब लैंगिक समानता का विषय विश्व भर में जोरों से चर्चा में है, यह अति अफसोसनाक है कि प्रदेश की आदिवासी महिलाओं को प्रथागत कानून के तहत भूमि के उत्तराधिकार से वंचित रखा गया है। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 कि धारा 7 एवं 8 में इस बात का उल्लेख है कि आदिवासी समाज में जमीन का उत्तराधिकार सिर्फ पुरुष वंश में ही किया जा सकता है। अर्थात, समाज की औरतों को इसका कतई अधिकार नहीं। हालांकि अधिनियम कि एक अन्य धारा पर गौर किया जाय तो यह मालूम होता  है कि यादि आदिवासी समाज में भूमि का हस्तांतरण, भेंट अथवा विनिमय किया जाना हो तो इसके लिए वंशानुगत पुरूष अथवा ‘अन्य ‘ योग्य है। जहां एक तरफ संथालपरगना के इलाके में ‘तानसेन जोम’ की परंपरा हैं, वही दूसरी तरफ संथालपरगना का

ईमानदारी की श्रेष्ठता

अजीब स्वभाव है मानव का! हमारी भले ही ईमान से जान पहचान ना हो, पर हम चाहते हैं कि हमारे संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति ईमानदार हों। व्यापार में, व्यवहार में , साहित्य में या संसार में सभी जगह ईमानदारी की मांग है।

नव वर्ष 2022 में राहु, केतु, शनि और गुरु ग्रहों का गोचर एवं उनका विभिन्न चंद्र राशियों पर होने वाला प्रभाव

2021 की समाप्ति और 2022 की शुरुआत बड़े ही नाटकीय ढंग से हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि 2021 के आखिरी महीने यानी की दिसंबर महीने में कोरोना के एक और रूप ओमीक्रॉन ने बड़े ही अलग तरीके से, बिना किसी लक्षण के अचानक ही पूरे विश्व पर धावा बोल दिया। भारत या अन्य देश इसके रूप, स्वरुप, असर, परिणाम  को जान और समझ पाते उससे पहले ही इसने लगभग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। कोरोना ने इस नए रूप में आकर सभी को एक बार फिर डरा दिया है।