Skip to main content

देश के सभी पत्रकारों को बीमा सुविधा दे सरकार- संतोष ठाकुर

जर्नलिस्ट वेलफेयर फंड की नवगठित कमेटी की पहली बैठक में यह मांग की गई कि देश के सभी पत्रकारों को, चाहे वह मान्यता प्राप्त हो या गैर मान्यता प्राप्त हो, सरकार की ओर से इंश्योरेंस / बीमा योजना दी जाए.  इस मांग पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण सचिव अमित खरे ने भी सकारात्मक रुख प्रदर्शित  किया है. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार की ओर से जर्नलिस्ट वेलफेयर फंड के तहत पत्रकारों की असामयिक मृत्यु एवं बीमारी पर आर्थिक सहायता दी जाती है. ऐसे में ना केवल दिल्ली और अन्य महानगरों के पत्रकार बल्कि मधुबनी, बेनीपट्टी,  रांची, पटना, त्रिपुरा , पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश,  तमिलनाडु , कर्नाटक,  केरल,  तेलंगाना,  आंध्र प्रदेश,  मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ , महाराष्ट्र , असम, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश व अन्य पूर्वोत्तर राज्य , गुजरात, जम्मू कश्मीर, अंडमान निकोबार और देश के सभी हिस्सों के ऐसे पत्रकारों की सूचना केंद्र सरकार को दी जाए जिन की असामयिक मृत्यु हो गई है या जो गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं और जिनके परिवार को आर्थिक सहायता की वास्तविक जरूरत है.

जर्नलिस्ट वेलफेयर  फंड के सदस्य एवं प्रेस एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष संतोष ठाकुर ने अपने मधुबनी बिहार दौरे के दौरान बातचीत में इसकी जानकारी देते हुए कहा कि हमने सरकार से कहा है कि गांव देहात में काम करने वाले पत्रकारों को भी बीमा दिया जाना चाहिए . जब भी मैं अपने गृह जिला मधुबनी आता हूं और यहां बेनीपट्टी, जयनगर,  कलुआही या ऐसी अन्य जगहों पर पत्रकारों को कार्य करते हुए देखता हूं तो यह पाता हूं कि वह काफी समस्याओं में घिर कर काम करते हैं.  उनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा भी नहीं होती है. यही हाल देश के सभी शहरों, कस्बों और गांवों में काम करने वाले पत्रकारों की भी है. यही हाल दिल्ली मुंबई या अन्य महानगरों में काम करने वाले पत्रकारों की भी है. ऐसे में सरकार 2000 से ₹3000 सालाना प्रीमियम वाली कोई ऐसी इंश्योरेंस योजना लाए जिसमें सभी पत्रकारों को कम से कम 50 लाख रुपए तक की बीमा राशि का प्रावधान हो. इसके लिए केंद्र सरकार के स्तर पर इंश्योरेंस कंपनियों को पत्रकारों को केंद्रित कर बीमा योजना लाने का निर्देश दिया जाए.

उन्होंने कहा कि बीमा कंपनियों को इस योजना से लाभ ही होगा. देश भर के लाखों पत्रकार, चाहे वह मान्यता प्राप्त हो या गैर मान्यता प्राप्त हो,  कंपनियों की बीमा  योजना लेंगे. जिससे उनके साथ एकमुश्त ही काफी राशि आ जाएगी. कई राज्य सरकार पत्रकारों को बीमा योजना देती है. लेकिन उसमें कई तरह के नियम/ उप- नियम बना दिए जाते हैं. जिससे उनका वास्तविक लाभ कुछ ही लोगों को मिल पाता है. ऐसे में केंद्र सरकार एक राशि स्वयं बीमा कंपनियों को दें तथा राज्य सरकारों को भी प्रेरित करें कि वह भी अलग-अलग बीमा योजना चलाने की जगह इन कंपनियों को ही अपनी ओर से एकमुश्त राशि दे दें. जिससे कि पत्रकारों को अधिकतम बीमा राशि का लाभ हासिल हो पाए.

ठाकुर ने कहा कि सरकार इस में गंभीर बीमारियों को तथा नौकरी छूट जाने पर कम से कम 6 महीने से लेकर 1 साल तक के बेसिक या पूर्ण वेतन की गारंटी का भी प्रावधान कर दें तो पत्रकारों को बड़ी राहत मिलेगी. देशभर के पत्रकार दिन-रात लोगों तक सूचना और सरकार की योजनाओं को पहुंचाने का काम बिना किसी लोभ लाभ के करते हैं. ऐसे में उन्हें यह सामाजिक सुरक्षा दी जानी चाहिए. कई राज्य सरकारें ऐसा कर रही हैं. लेकिन यह कार्य अलग-अलग रूप से किया जा रहा है. उसे केवल एक केंद्रीय और व्यवस्थित रूप देने की जरूरत है. इसकी अगुवाई केंद्र सरकार करे. बीमा कंपनियों को निर्देश दें की पत्रकारों के लिए एक खास तरह की बीमा योजना लाए जिसमें उन्हें 5000000 से ₹10000000 तक की बीमा राशि की गारंटी हो. साथ ही बीमार होने या नौकरी छूट जाने पर भी एक निश्चित अवधि तक उनको सहायता राशि हासिल होने की गारंटी हो. 

संतोष ठाकुर, जो मैथिल पत्रकार ग्रुप के अध्यक्ष भी हैं, ने बताया कि हमने सरकार से अनुरोध किया है कि वह इसके लिए पीआईबी की वेबसाइट पर या फिर सूचना प्रसारण मंत्रालय के तहत ऐसा कोई वेब पेज बनाएं जिस पर इच्छुक पत्रकार अपना नाम दर्ज करा पाए. इससे सरकार की सभी को सामाजिक सुरक्षा देने की नीति और उद्देश्य को भी गति हासिल होगी.  उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है तो ऐसा करना मुमकिन भी है. प्रधानमंत्री के निर्देश पर किसानों, असंगठित क्षेत्र के कामगारों के साथ ही अन्य वर्ग के लिए भी कई तरह की योजनाएं चल रही हैं.  ऐसे में पत्रकारों के लिए भी केंद्र सरकार निश्चित तौर पर इस तरह की बीमा योजना शुरू कर सकती है. ऐसा उन्हें विश्वास है. उन्होंने केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर एवं केंद्रीय सूचना प्रसारण सचिव अमित खरे की ओर से जर्नलिस्ट वेलफेयर फंड से प्रभावित पत्रकारों के परिजनों को ₹500000 तक की सहायता राशि जारी करने में दिखाई गई तत्परता को लेकर भी उनका धन्यवाद किया.

Comments

Most Popular

ज्योतिष विज्ञान और कोरोना- ज्योतिषाचार्य राजकिशोर

वर्त्तमान समय में कोरोना महामारी एक ऐसा संकट है , एक ऐसी समस्या है जिससे न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि पूरा विश्व जूझ रहा है। बार बार लोगों के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ एक ही सवाल आ रहा है और उस सवाल ने सभी की रातों की नींद उड़ा कर रख दी है कि कोरोना महामारी का अंत कब होगा ? इस महामारी के संकट से कैसे और कब छुटकारा मिल पायेगा ?

धरती का सबसे छोटा बच्चा!

काका उदास थे। उदासी उनके पास कोई पड़ा कारण नहीं था। बदलती आबोहवा से जब भी परेशानी होती है, उदासी उनके चेहरे पर बैठ जाती है। जब कोई चिड़िया गीत गाती हुई फुर्र से उड़ती है या कोई वृक्ष तेज हवा में घूमने लगता है, तब जाकर उनका चेहरा सामान्य हो पाता है। वे बड़ी देर से चुप बैठे थे। जो व्यक्ति खुद में उतर रहा हो या सामने किसी दृश्य को टटोल रहा हो, उसे टोकना अच्छी बात नहीं है। मौन में भी मजे है। मैं कभी-कभी सोचने लगती हूं कि पृथ्वी पर चिड़िया कब आयी होगी। हठात काका का मौन टूटा। वे मुझसे पूछ रहे थे कि तुम्हें क्या लगता है, पृथ्वी पर मानव पहले आया होगा और बहुत दिनों के बाद जब वह बोर होने लगा होगा, तब चिड़िया बनायी गयी होगी! मुझे चुप देख कहने लगे कि मनुष्य के पास चिड़िया बनाने का कोई हुनर नहीं है। इतने उपकरण और होशियार हो जाने के बाद, अगर आज भी मानव चिड़िया बनाने बैठे तो असफलता ही हाथ लगेगी। इस बात से यह साबित होता है कि मानव बाद में आया होगा, चिड़िया पहले आयी होगी। वे कहने लगे कि वृक्ष चिड़िया का घर तो होता ही है, साथ ही उनका जीवन भी होता है। पृथ्वी पर पहले वृक्षों को लगाया गया होगा कि चिड़िया आ

झारखंड का आदिवासी समाज और भूमि का उत्तराधिकार!

यूं तो झारखंड के आदिवासी समाज में औरतों की स्थिति, अन्य समाज की स्त्रियो की तुलना में पुरुष से संपत्ति के अधिकार की हो, तो ये उन सारी महिलाओं से पिछडी है जो अन्य क्षेत्रों में इनका अनुकरण करती है। आपको यह जानकर विस्मय होगा कि राज्य के जनजातीय समाज में महिलाओं को अचल संपत्ति में कोई वंशानुक्रम का अधिकार नहीं दिया जाता है। वर्तमान युग में, जब लैंगिक समानता का विषय विश्व भर में जोरों से चर्चा में है, यह अति अफसोसनाक है कि प्रदेश की आदिवासी महिलाओं को प्रथागत कानून के तहत भूमि के उत्तराधिकार से वंचित रखा गया है। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 कि धारा 7 एवं 8 में इस बात का उल्लेख है कि आदिवासी समाज में जमीन का उत्तराधिकार सिर्फ पुरुष वंश में ही किया जा सकता है। अर्थात, समाज की औरतों को इसका कतई अधिकार नहीं। हालांकि अधिनियम कि एक अन्य धारा पर गौर किया जाय तो यह मालूम होता  है कि यादि आदिवासी समाज में भूमि का हस्तांतरण, भेंट अथवा विनिमय किया जाना हो तो इसके लिए वंशानुगत पुरूष अथवा ‘अन्य ‘ योग्य है। जहां एक तरफ संथालपरगना के इलाके में ‘तानसेन जोम’ की परंपरा हैं, वही दूसरी तरफ संथालपरगना का

ईमानदारी की श्रेष्ठता

अजीब स्वभाव है मानव का! हमारी भले ही ईमान से जान पहचान ना हो, पर हम चाहते हैं कि हमारे संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति ईमानदार हों। व्यापार में, व्यवहार में , साहित्य में या संसार में सभी जगह ईमानदारी की मांग है।

नव वर्ष 2022 में राहु, केतु, शनि और गुरु ग्रहों का गोचर एवं उनका विभिन्न चंद्र राशियों पर होने वाला प्रभाव

2021 की समाप्ति और 2022 की शुरुआत बड़े ही नाटकीय ढंग से हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि 2021 के आखिरी महीने यानी की दिसंबर महीने में कोरोना के एक और रूप ओमीक्रॉन ने बड़े ही अलग तरीके से, बिना किसी लक्षण के अचानक ही पूरे विश्व पर धावा बोल दिया। भारत या अन्य देश इसके रूप, स्वरुप, असर, परिणाम  को जान और समझ पाते उससे पहले ही इसने लगभग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। कोरोना ने इस नए रूप में आकर सभी को एक बार फिर डरा दिया है।