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महारानी चंद्रिका

यह कहानी १९०३ की है जब अंग्रेज हिंदुस्तान पर अपने अधिकार के सर्वोपरि मुकाम पे थे। उस समय बिहार के जबलपुर गाँव में महारानी चंद्रिका की सेना अपनी डेरा बसाए हुए थी। वे और उनकी सेना आधुनिक से आधुनिकतम हथियारों के इस्तेमाल से वाकिफ़ थे। और यही प्रधान वजह थी कि महारानी के एक हजार सैन्य ब्रिटिश जनरलों को चैन से सोने नहीं देते थे। उनकी बड़ी से बड़ी सेना भी चंद्रिका के कौशलपूर्वक छापामारा हमलों के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो जाते थे। परंतु इस बार

चुनौती दूसरी थी और स्थान भी दूसरा था। इस बार उन्हें जनरल वॉरेल को खुद उनके रेसीडेंसी में जाकर मारना था जो उनके निपुण सेना के लिए भी लगभग असंभव था। परंतु किसी भी चुनौती की कठिनता इस विरांगना को डराने के काबिल नहीं थी और फिर वॉरेल तो खुद उनके पिता के हत्यारे थे।

गहरी रात का समय था। महारानी ने रेसीडेंसी के गुप्त द्वार पर खड़े दोनों सैनिकों को जहरीले डंक से मार गिराया और फिर वे अंदर घुस गई और फिर एक के बाद सारे सैनिकों को चुपचाप मौत की नींद सुलाती गई। फिर अचानक ही उन्हें वॉरेल का शयनकक्ष दिखा। वह दरवाजा खोलकर वॉरेल को जगा हुआ देखकर चौंक गई। वरिल ने उनका स्वागत करने के ढोंग में कहा- 'वेलकॅम चंद्रिका वेलकम टू डेथ आखिर कार तुम्हें मेरे हाथों ही मरना है, यह कहते हुए उन्होंने अपने बाएँ हाथ से एक चाकू चंद्रिका पर फेंक दिया जिसे अनायास ही उसने रोक लिया। अचानक ही घर में भयंकर गोलीबारी शुरु हो गई। एक गोली चंद्रिका के हाथ में लग गई। परंतु वे तेजी से उस घर से निकल आई। बाहर अब तक भयंकर गोलीबारी शुरू हो गई थी, और चंद्रिका की सेना अपनी कुशलता के बावजूद ब्रिटिश की संख्या के सामने हारती हुई नज़र आ रही थी। ब्रिटिश गोलियों के नीचे शहीद हो गए। फिर अचानक ही चंद्रिका ने वॉरल को अपने गार्डस के साथ भागते हुए देखा। महारानी ने उनका पीछा किया और अपनी अचूक निशानेवाजी से वॉरेल और उनके गार्डस को मौत की नींद सुला दिया। इसके बाद ब्रिटिश सेना में खलबली मच गई और वे हार गए। महारानी चंद्रिका रेसीडेंसी के ऊपर तिरंगा लहराने के बाद भयंकर रक्तपात के कारण जमीन पर गिर गई और जय हिंद' कहते हुए वीरता को प्राप्त हुई।


-प्रेरणा यादव

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