'मन की बात' पर रिसर्च: वरिष्ठ पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल को मिली डॉक्टरेट की उपाधि

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल के नाम के आगे अब 'डॉक्टर' लग गया है। उन्हें उनके विशेष शोध कार्य के लिए डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें फरीदाबाद के मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज के दीक्षांत समारोह में केंद्रीय स्वास्थ्य

एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा के हाथों मिला।

डॉ. बर्णवाल ने अपना यह रिसर्च प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मशहूर रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर किया है। उनके शोध का विषय था- "प्रधानमंत्री के 'मन की बात' रेडियो कार्यक्रम का सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण"। उन्होंने यह काम प्रोफेसर डॉ. कुमार राजेश की देखरेख में पूरा किया।

यह रिसर्च अपनी तरह का पहला ऐसा प्रयास है जो संयुक्त राष्ट्र के 2030 तक के 'सतत विकास लक्ष्यों' (जैसे गरीबी हटाना और अच्छी शिक्षा) को 'मन की बात' से जोड़ता है। शोध में बताया गया है कि कैसे पीएम मोदी ने कठिन वैश्विक लक्ष्यों को आम आदमी की भाषा में समझाकर एक 'जन-आंदोलन' में बदल दिया।


डॉ. बर्णवाल ने हवा-हवाई बातें नहीं, बल्कि ठोस डेटा के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की है। उन्होंने 2014 से 2019 के बीच प्रसारित 'मन की बात' के 53 एपिसोड्स का बारीकी से अध्ययन किया। उनके आंकड़ों के मुताबिक:
स्वच्छता: पर सबसे ज्यादा 34 बार बात हुई।
शिक्षा: 28 एपिसोड्स में छाई रही।
महिला सशक्तिकरण: पर 27 बार चर्चा हुई।
स्वास्थ्य और पर्यावरण: पर क्रमश: 25 और 21 बार संवाद हुआ।

रिसर्च में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि पीएम मोदी की 'किस्सागोई' (Storytelling) ने लोगों का व्यवहार बदल दिया। 'विकलांग' की जगह 'दिव्यांग' शब्द का इस्तेमाल हो या 'सेल्फी विद डॉटर' जैसा कैंपेन—इन सबने समाज की सोच को कैसे बदला, इसे वैज्ञानिक तरीके से इस शोध में साबित किया गया है।

यूनिवर्सिटी का मानना है कि यह रिसर्च पेपर सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं, बल्कि राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के छात्रों के लिए भी एक गाइड का काम करेगा। अच्छी खबर यह है कि डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल का यह शोध जल्द ही एक किताब के रूप में भी प्रकाशित होगा, ताकि आम लोग भी इसे पढ़ सकें।

दीक्षांत समारोह के दौरान फैकल्टी सदस्यों और अकादमिक जगत के विशेषज्ञों ने डॉ. बर्णवाल को इस राष्ट्रोपयोगी शोध के लिए बधाई दी। कुल मिलाकर, ‘मन की बात’ पर हुआ यह अकादमिक अध्ययन मीडिया और जन-संवाद की ताकत को नए सिरे से सामने लाता है।

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